Learn Tally Accounting with GST
Chapter -1

What is Tally ERP-9
Tally ERP-9 क्या है ?
Tally ERP-9 का परिचय
Tally ERP9 – An Introduction
हम जिस Course को करने जा रहे है, हमे उसके बारे में पता भी होना चाहिए की Tally ERP9 हमारे किस काम आएगा ? What is Tally Accounting?
किसी भी बिज़नेस का उद्देश्य होता है लाभ कमाना और इसके लिए यह जरुरी है की हम उसका हिसाब-किताब बिलकुल साफ़-सुथरा और सही रखे |
पहले यह काम manual होता था, परंतु अब यही काम computer के जरिए करते हैं | इससे एक तो समय की बचत होती है। दूसरी कि गलती होने की संभावना भी कम होती है । पहले Accounting का काम manual करने में कई-कई दिन लग जाते थे।
Digital Accounting System
आज Computer Accounting Software की मदद से वही काम मिनटों में हो जाता है। Computer में Accounting करने के लिए हमें Accounting Software की जरुरत होती है और Tally भी इसी प्रकार का बहुत ही प्रसिद्ध Accounting सॉफ्टवेर है।
पहले जैसे कि Accounting का काम Manually अर्थात् कलम और कागज द्वारा होता था, जिसमें काफी time लगता था, लेकिन आज वही काम को हम Tally Accounting Software के जरिए आसानी से कर सकते हैं। इसके मदद से हम अपनी Business की Voucher Entry खुद भी कर सकते हैं।

Tally.Erp 9 एक बहुत ही शानदार Accounting software है | इस software ने Business के क्षेत्र में बहुत में प्रसिद्धि हासिल की है |
कोई भी businessman एक ऐसा system चाहता है जिससे वो अपने business को आसानी से manage और handle कर सके | Tally.Erp 9 सॉफ्टवेर businessman की सभी जरूरतों को पूरा करता है |
Bharat Goenka, Managing Director है Tally Solutions, India के जो अब business accounting software के क्षेत्र में अग्रणी company बन चूका है |
इसका slogan है POWER OF SIMPLICITY. जो सही भी है |
एस एस गोयनका टैली सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक अध्यक्ष थे | भारत गोयनका सह संस्थापक एवं टैली सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक है | इनको नैस्कॉम द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया | Cell IT, एक आईटी चैनल पत्रिका द्वारा, एक लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया गया है |
छोटे व्यवसाय से लेकर बड़े से बड़े large scale multinational companies के accounts को आसानी से Tally.ERP 9 सॉफ्टवेर के द्वारा बहुत ही आसानी से manage किया जा सकता है|
Tally.Erp 9, Accounting software के द्वारा TDS, Service tax, VAT, GST जैसे टैक्स सर्विस का पूर्ण रूप से लेखा जोखा रखा जा सकता है | JIIT Academy में Tally या Tally.ERP 9 सीखना बहुत ही आसान है |
Features of Tally ERP9 –
- इस software को Multi Language में यानि कई भाषा में Operate किया जा सकता है| क्यूंकि Tally ERP9 एक Popular Accounting Software है | Accounting के लिए कई Countries में Tally को Use किया जाता है और इस Software की बहुत Demand है |
- इसमें एक साथ 1,2 या 3 नहीं बल्कि एक साथ 99999 Companies का Account Maintain किया जा सकता है | Company Creation in Tally
- यह Software, Accounting के काम को बहुत ही ज्यादा आसान कर देता है | इसमें कई ऐसे Features होते है जिन से हम किसी भी Company की किसी भी तरह की रिपोर्ट को देख सकते है और Account maintain कर सकते है |
Qualification for Tally Course-
अब सवाल ये है कि Tally या Tally ERP9 सिखने के लिए किस qualification कि जरुरत होती है या Tally ERP9 कौन सीख सकते है | ये बहुत ही Common Questions है जो बार बार पूछे जाते है.
1. क्या Arts background के लोग Tally सीख सकते है ?
2. मेरा background commerce नहीं है क्या मै Tally सीख सकता हूँ ?
3. मै computer operator हूँ, क्या मै Tally सीख सकता हूँ ?
4. 12th या 10th pass हूँ क्या मै accountant बन सकता हूँ ?
तो देखिये Tally सीखना और Accountant बनना दोनों में फर्क है – Tally ERP9 भी एक course की तरह है जिस तरह आप दूसरे course भी करते है लेकिन accountant बनने के लिए time और hardwork दोनों की जरुरत है और accountant बनने के लिए Tally erp9 को भी सीखना जरुरी है |
Computer Operator को बहुत ही कम Salary मिलती है वही अगर आप Tally अच्छे से सीख लेते है और Experienced Accountant बन जाते है तो आप अच्छी Monthly income कर सकते है |
Tally सिखने के बाद आपको बेहतर जॉब करने का अवसर मिलता है | जब से GST लागु हुआ है तब से Tally Operator के जॉब की डिमांड और Job Requirement बहुत बढ़ गयी है| आप इस Course को करके कहीं पर भी आसानी से Job पा सकते है |
Tally ERP9 का course करके, Tally erp9 को अच्छे से समझ कर Tally erp9 में काम करके आप accountant जरुर बन सकते है | Tally का जितना ज्यादा Experience आपको होगा उतना ही ज्यादा आपकी आमदनी होगी | Working Experience लेने के बाद आप Tally operator se Accountant आसानी से बन सकते है |
- What is Tally ERP-9
- How to start work in Tally
- Tally ERP-9 क्या है ?
- Tally ERP-9 का परिचय
- An Introduction – Tally ERP 9
- Company Creation in Tally
- What is Voucher in Tally
- Types of Vouchers in Tally
- Ledger Creation in Tally
Tally या Tally-ERP 9 को शुरु करने से पहले Accounting के Terms को समझते है –
Terms of Tally Software
Tally software में काम करने के लिए हमें निम्नलिखित Terms की जरुरत होती है, इसलिए Tally के Terms को समझना जरुरी है –
1. व्यापार (Trade) –
- लाभ कमाने के उद्देश्य से वस्तुओं का क्रय-विक्रय व्यापार कहलाता है ।
2. पेशा (Profession) –
- आय अर्जित करने के लिए किया गया कोई भी कार्य, जिसके लिए पूर्व प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, पेशा कहलाता है। जैसे- डाॅक्टर , वकील , इन्जीनियर आदि द्वारा किया गया कार्य पेशा कहलाता है ।
3. व्यवसाय (Business) –
- ऐसा कोई भी वैधानिक कार्य जो लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया हो, व्यवसाय कहलाता है। व्यापार व पेशा भी व्यवसाय के अन्तर्गत ही आते हैं ।
4. मालिक (Owner) –
- वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह जो व्यापार में पूंजी लगाते हैं तथा लाभ व हानि को सहते हैं, मालिक कहलाते हैं ।
मालिक (Owner) भी तीन तरह के होते हैं ।
- एकांकी मालिक (Proprietor) – जब कोई व्यक्ति अकेला ही पूंजी लगाकर व्यापार प्रारंभ करता है, एकांकी मालिक Proprietor कहलाता है ।
- साझेदार (Partners) – जब दो व्यक्ति पूंजी लगाकर कोई व्यापार प्रारंभ करते हैं, तो वे साझेदार यानि कि Partners कहलाते हैं ।
- अंशधारी (Share Holder) – दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर एक समूह के रुप में एक कम्पनी के लिए काम करते हैं, वे अंशधारी अर्थात् Share Holders कहलाते हैं ।
5. पूंजी (Capital) –
- व्यापार के स्वामी जो रुपया माल अथवा संपत्ति व्यापार में लगाता है, वह पूंजी कहलाता है। मान कि जैसे आप कोई बिजनेस शुरु करते हैं, उसमें आपने 10000 रु. cash लगाए हैं और 5000 रुपए का माल खरीद कर लगाया है, तो आपकी पूंजी हो गई कुल 15000 रुपए।
6. आहरण (Drawing) –
- व्यापार का मालिक अपने निजी खर्च के लिए समय-समय पर व्यापार में से जो रुपया अथवा माल निकालता है, वह उसका आहरण अथवा खर्च कहलाता है ।
मान ले, एक Readymade कपडे़ की दुकान है, और उसका मालिक दुकान के माल में से 1000 रुपये के कपडे़ अपने परिवार वालों के लिए निकाल लेता है, तो यह 1000 रुपया, उसका आहरण निजी खर्च कहलाएगा विक्रय नहीं ।
7. माल (Goods) –
- माल उस वस्तु को कहते हैं जिसे बेचा या खरीदा जा सकता हैं ।
माल (Goods) भी तीन तरह के होते हैं –
- पूरी तरह तैयार माल – ऐसा माल जो पूरी तरह से तैयार हो, तैयार माल कहलाता है। जैसे-कि लकडी का बना बनाया बेंच ।
- कच्चा माल – जैसे कि बेंच ही बना बनाया हुआ हैं लेकिन चूँकि यह लकडी से तैयार किया गया है तो लकड़ी कच्चा माल कहलाएगा ।
- अर्द्धनिर्मित माल – बेंच बनने की प्रक्रिया में बेंच का ढाँचा तो बन चुका है परन्तु यह पेन्ट नहीें हुआ है तो वह बेंच का ढाँचा अर्द्धर्निमित माल कहलाएगा ।
8. क्रय (Purchase) –
- पुनः विक्रय के उद्देश्य से व्यापार में खरीदा गया माल क्रय या खरीदी कहा जाता है ।
उदाहरण के लिए कोई कपड़ा व्यापारी अपने व्यापार के लिए कपड़ा खरीदता है तो यह क्रय हुआ। जिसे हम stock या inventory में रखेंगे | परंतु अपने दुकान के संचालन के लिए फर्नीचर खरीदता है तो यह क्रय नहीं हुआ, क्योंकि वह पुनः फर्नीचर का विक्रय नहीं कर रहा है । इसलिए फर्नीचर Assets (Fixed) कहलायेगा |
9. विक्रय (Sales) –
- जो माल बेचा जाता है, वह विक्रय कहलाता है ।
विक्रय भी दो तरह के होते हैं ।
- नगद विक्रय (Cash Sales) – जो माल नगद बेचा जाता है, वह नगद विक्रय अर्थात् Cash Sales कहलाता है ।
- उधार विक्रय (Credit Sales) – जो माल उधार बेचा जाता है, उसे उधार विक्रय या Credit Sales कहते हैं ।
- Note : नगद एवं उधार विक्रय को मिलाकर कुल विक्रय यानि कि Turnover कहा जाता है ।
10. क्रय वापसी (Purchase Return) –
- जब खरीदे गए माल में से कुछ माल विभिन्न कारणों से वापस कर दिया जाता ह, उसे क्रय वापसी (Purchase Return) कहते हैं ।
- Example के लिए आपने 100 रुपये में 10 Pen खरीदा लेकिन किसी कारणवश उसमें दो pen खराब निकल गए और आपने उसे लौटा दिया तो इसे ही क्रय वापसी – Purchase Return कहेंगे ।
11. विक्रय वापसी (Sales Return) –
- जब बेचे हुए माल का कुछ भाग हमें कोई वापस लौटा देता है, तो वह विक्रय वापसी कहलाता है । जैसे कि आपने 100 रुपये में 5 काॅपी किसी को बेचा परन्तु खरीददार किसी कारणवश 2 काॅपी लौटा देता है, तो वह विक्रयवापसी कहलाएगा ।
Terminology of Accounting –
लेखांकन की शब्दावली
1. रहतिया (Stock) –
- आम बोल-चाल की भाषा में आपने सुना होगा कि अमुक दुकानदार के पास, अच्छा Stock है। इसका मतलब रहतिया होता है । किसी भी व्यापार में दुकानदार के पास वर्तमान में जो माल उपलब्ध होता है वही उसका stock कहलाता है ।
Stock भी दो तरह के होते हैं ।
- Closing Stock – साल के अंत में जो माल बिना बिके रह जाता है, Closing Stock कहलाता है ।
- Opening Stock – अगले साल के पहले दिन वही माल Opening Stock कहलाता है ।
2. लेनदार (Creditors) –
- वह व्यक्ति या संस्था जो दूसरों को माल या ऋण उधार के तौर पर देती है, ऋणदाता, लेनदार या क्रेडिटर कहलाती है । यानि उधार में माल बेचने वाला व्यक्ति क्रेडिटर (creditor) कहलाता है । इस व्यक्ति को भविष्य में जिसे उसने उधार दिया है उससे धनराशि प्राप्त होने वाला होता है |
- उदाहरण के लिए आपने अपने दोस्त को 1000 रुपये उधार दिए तो यहाँ पर आप क्रेडिटर कहलाएँगे और आपने किसी को माल उधार बेचा है तो भी आप क्रेडिटर कहलायेंगे |
3. देनदार (Debtors) –
- वे व्यक्ति या संस्थाएँ जो दूसरे व्यक्ति या संस्था से माल, सेवाएँ तथा ऋण उधार के तौर पर लेती है, देनदार, ऋणी या देब्टर (Debtor) कहलाता है । यानि में उधार में माल खरीदने वाला व्यक्ति ऋणी, देनदार या Debtor कहलाता है ।
- इस व्यक्ति को भविष्य में एक निश्चित दिन या निश्चित अवधि के बाद पैसा चुकाना होता है । जैसे आपने अपने दोस्त को 2000 रुपये का माल उधार में बेचा, तो यहाँ पर आपका दोस्त ऋणी या debtor कहलाएगा ।
4. दायित्व (Liabilities) –
- वे सब ऋण जो व्यापार को अन्य व्यक्तियों अथवा स्वामी एवं स्वामियों के प्रति चुकाने हैं, दायित्व कहलाते हैं।
दायित्व (Liabilities ) दो प्रकार के होते हैं –
- स्थायी दायित्व (Long Term or Fixed Liabilities) – ये वे उधार होते हैं जो एक साल से ज्यादा समय के बाद या व्यापार समाप्ति पर चुकाने होते हैं ।
उदाहरण के लिए आपने दो साल के लिए अपने दुकान के लिए कुछ फर्नीचर खरीदा और इसका पैसा आपको दो साल के बाद चुकाना है तो यह स्थायी दायित्व (Fixed Liabilities या Long Term Liabilities) कहलाएगी |
- चालु दायित्व (Short Term Liabilities or Current Liabilities) – ये वे Liabilities या ऋण होते है, जो एक साल या उससे कम अवधि में चुकाने होते हैं ।
उदहारण के लिए- यदि आपको किसी संस्था को एक साल के अन्दर उधार पैसे जो कि आपने लिया है, चुकाना हो तो यह चालू दायित्व (Short Term Liabilities or Current Liabilities) कहलाएगी ।
5. संपत्ति (Assets) –
- व्यापार में समस्त वस्तुएँ जो कि व्यापार के संचालन में सहायक होती हैं संपत्ति कहलाती हैं ।
यह दो प्रकार के होते हैं ।
- अचल /स्थायी संपत्ति (Fixed Assets) – वे संपत्ति या वस्तुएँ जो व्यापार को चलाने के लिए स्थायी रुप से खरीदी जाती है, Fixed Assets कहलाती हैं इनका उपयोग बार-बार होता है और इन्हें बेचने के लिए नहीं खरीदा जाता ।
ऐसी संपत्तियां व्यापार की आय बढ़ाने में मदद करती हैं। जैसे- भवन , फर्नीचर , मशीनें , मोटरगाड़ी इत्यादि ।
- चल/ अस्थायी संपत्ति (Current Assets) – ये संपत्ति कभी भी स्थायी रुप से व्यापार में नहीे रहती हैं जैसे नकद पैसा (cash), बैंक में जमा धन, stock तथा वे सभी संपत्तियां जो आसानी से नकदी में परिवर्तित हो सकती हैं Current Assets कहलाती है।
6. व्यय (Expenses) –
- माल के उत्पादन में एवं उसे बेचने में जो भी खर्च होते हैं वें ब्यय अर्थात् Expenses कहलाते हैं।
ये भी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं।
- प्रत्यक्ष व्यय (Direct Expense) – ये वे खर्च होते हैं, जिन्हें ब्यापारी माल खरीदते वक्त करता है या माल के उत्पादन में करता है कच्चा या पक्का माल खरीदने में लगाया गया भाड़ा एवं उसे गोदाम तक पहुँचाने में लगा पैसा इसमें शामिल किया जाता है।
संक्षेप में कच्चे माल से लेकर वस्तु के निर्माण एवं उसे बेचने तक में जो भी खर्च होता है, उसे Direct Expense या प्रत्यक्ष व्यय कहते हैं। इसमें मजदूरी, गाड़ी भाड़ा इत्यादि शामिल है।
- अप्रत्यक्ष ब्यय (Indirect Expense) – अप्रत्यक्ष व्यय में वैसे खर्च आते हैं जिसका संबंध वस्तु के निर्माण एवं खरीद आदि से संबंधित न होकर वस्तु की बिक्री या कार्यालय संबंधी ब्यय से होता है।
ऐसे खर्च का प्रभाव, बिक्री की जाने वाली माल के लागत पर बिल्कुल नहीं पड़ता। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित खर्च आते हैं-विज्ञापन का खर्च, Employee को दिया जाने वाला वेतन, ग्राहको को दी जाने वाली छूट, पूँजी या ऋण पर ब्याज आदि।
7. राजस्व (Revenue) –
- Goods (माल) या Service को बाजार में बेचने के बाद उससे जो प्राप्ति होती है राजस्व या Revenue कहलाती है।
8. आय (Income) –
- किसी भी माल या service को market में बेचने के बाद Revenue प्राप्त होता है और उस Revenue से Expenses घटा देने के बाद जो राशि बचती है उसे आय कहते है|
आय दो तरह की हो सकती है।
- प्रत्यक्ष आय (Direct Income) – Direct Income वह Income है, जो हमें मुख्य व्यवसाय से मिलती है, Example – Income from soap industry.
- अप्रत्यक्ष आय (Indirect Income) – वैसी आय जो मुख्य व्यवसाय के अलावा जो Income होती है, उसे अप्रत्यक्ष आय कहते है |
मान लीजिए कि हमारी Soap Industry के अलावा हमारे कुछ 4-5 गोदाम भी हैं और हमने उन सभी को किराए पर दिया है, तो उनका जो Income है वह Indirect Income कहलाएगा।
9. बट्टा या छूट (Discount) –
- व्यापारी द्वारा अपने ग्राहकों को दी जाने वाली रियायत ही बट्टा या छूट कहलाती है।
यह दो तरह की होती है।
- व्यापारिक बट्टा (Trade Discount) – माल बेचते समय व्यापारी जब ग्राहक को माल में कुछ छूट या बिल में कोई कटौती करता है, तो वह व्यापारिक बट्टा कहलाता है। यह छूट ग्राहकों को अधिक माल खरीदने के लिए प्रेरित करता है, इस छूट को बिल में ही कम कर दिया जाता है।
- नगद बट्टा (Cash Discount) – व्यापारिक चलन के अनुसार प्रत्येक ग्राहक को नगद भुगतान करने के लिए जो नगद में छुट दी जाती है उसे Cash Discount कहते है | एक निश्चित अवधि में यह cash Discount भी प्रतिशत के रूप मे दिया जाता है जिससे कि ग्राहक शीघ्र भुगतान करने के लिए प्रेरित होता है।
10. डूबता ऋण (Bad Debts) –
- व्यापारी द्वारा उधार दी गई ऋण पूरी तरह मिल ही जाए यह आवश्यक नहीं हैं अतः उधार दिए गए ऋण में से जो पैसा वापस नहीं मिल पाता या जिसके मिलने की संभावना खत्म हो जाती हैं वह Bad Debts कहलाता हैं |
उदहारण के लिए – मोहन ने सोहन को 1000 रूपये उधार दिए, जिसमें से मोहन को 500 रूपये ही मिल पाए और सोहन चूँकि इस स्थिति में नहीं हैं कि वह 500 रूपये और लौटा सके यही 500 रूपया bad debts कहलाएगा । यह व्यापार के लिए हानि होती हैं।
11. लेन-देन (Transaction) –
- व्यापार में माल संबंधी क्रय-विक्रय और वस्तुओं का पारस्परिक आदान-प्रदान ही Transaction कहलाता है। ऐसे सभी लेन-देन मुद्रा (currency) में होते हैं। मुद्रा का भुगतान तुरन्त या भविष्य में भी किया जा सकता हैं। व्यापार द्वारा किए जाने वाले सभी आदान-प्रदान लेन-देन कहलाते हैं।
(जब सौदे का तुरन्त भुगतान किया जाता हैं तो वह नगद लेन-देन (Cash Transaction) कहलाता हैं। और जब भुगतान भविष्य में किया जाता है, तो वह उधार लेन-देन (Credit Transaction) कहलाता है)।
12. प्रमाणक (Voucher) –
- व्यापार सम्बन्धी सभी लेन-देनों या व्यवहारों के लिए जिसमें लिखित रूप में कागज़ लिए या दिए जाते हैं वह प्रमाणक या voucher कहलाते है।
- उधार क्रय-विक्रय हेतु बिलों रूपयों के लेन-देनों के लिए रसीदों, बैंको में जमा करने हेतु slip व बैंक से रूपया निकालने हेतु cheque आदि सभी voucher या प्रमाणक कहलाते हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें एक सबूत या प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
What is Accounting?
Accounts की परिभाषा

Accounting Word बहुत छोटा है लेकिन इसका complete course बहुत बड़ा है | जो Commerce के छात्र है वो अच्छे से जानते है कि Accounting क्या है ? फिर भी जो नहीं जानते है उनको Accounting का छोटा सा Introduction देते है –
Accounting का हिंदी में अर्थ होता है लेखांकन और लेखांकन २ शब्दों से मिलके बना है –
लेखा + अंकन = लेखांकन
लेखा = लिखना और अंकन = अंक
अर्थात लेखांकन का मतलब होता है अंको को लिखना |
अथवा –
किसी व्यक्ति, विशेष या लाभ – हानि आदि विवरणों को संक्षिप्त रूप से हिसाब-किताब की पुस्तकों में लिखा जाता हैं,यह तारीख के क्रमानुसार होता हैं। जिसे शीर्षक के अन्तर्गत इन जानकारियों को रखा जाता है, वही शीर्षक Accounts कहलाता है।
Example : माना कि सोहन नाम का एक व्यक्ति है, और उसका एक छोटा-मोटा बिजनेस है तो उसके सारे लेन-देन का विवरण उसके खाते के अन्तर्गत आ जाएँगे, यह सभी लेखा पुस्तक में संक्षिप्त में एक ही स्थान पर आ जाएगा इसे Sohan Traders का खाता कहेंगे।
Sohan Trader’s Account
Dr.(Debit) Cr.(Credit)
Date Particulars Amount. Date Particulars Amount.
खाते के दो पक्ष होते हैं,एक नाम पक्ष यानि कि Debit Side और दूसरा जमा पक्ष यानि Credit side | Debit side left की तरफ होता है। Tally में खाता यानि account को ही Ledger कहा जाता हैं।
CLASSIFICATION OF ACCOUNTS
खातों का वर्गीकरण
खाते (ACCOUNTS) तीन प्रकार के होते हैं।
- Personal Accounts (व्यक्तिगत खाते) – किसी व्यक्ति, फर्म या संस्थाओं से संबंधित खाते Personal Accounts कहलाते हैं। जैसे कि Ram Account, Asha Traders का A/c, Bank A/c इत्यादि।
Note : Capital A/c और Drawings A/c भी personal A/c के अन्तर्गत आते हैं क्योंकि ये व्यापार के मालिक का प्रतिनिधित्व करते हैं इस खाते के Balance से ही व्यापारी जान पाता है कि उसे किसे कितना रुपया देना है और किससे कितना रुपया लेना है।
- Real Accounts (वास्तविक खाते) – ये वे खाते होते हैं जो कि वस्तु या सम्पति से संबंधित होते हैं|
जैसे Cash A/c, Furniture A/c, Machinery A/c, Building A/c, Land A/c, Motor A/c इत्यादि। Real Account का Balance हमेशा Debit होता हैं।
- Nominal Accounts (नाममात्र खाते) – ये वे खाते होते हैं जो कि वस्तु या सम्पति से संबंधित होते हैं|
जैसेः- Interest A/c, Discount A/c, Commission A/c, Wages A/c, Purchase A/c, Sales A/c, etc. इन खातों का total साल भर के आय एवं व्यय को दर्शाता है और साल के अंत में इन्हें व्यापार के लाभ-हानि खाते में हस्तान्तरित करके बंद कर दिया जाता है |
RULES OF DEBIT AND CREDIT
(खातों को लिखने के नियम)
Rule of Accounting :
Note :- तीनों खातों के लिए Rules of Debit & Credit अलग-अलग हैं।
Personal A/c (व्यक्तिगत खाता) :
- पाने वाले को Debit करें तथा देने वाले को Credit करें । Debit the Receiver Credit the giver
Note : जब भी हम कोई लेन-देन करते है, तो इससे दो खाते प्रभावित होते हैं।
उदाहरण : मान लिजिए हमने Ram को हजार रूपये चुकाए, तो यहाँ पर दो Account प्रभावित हो रहे है –
-
- Ram का Account जो कि Personal A/c के अन्तर्गत आता हैं ।
- Cash A/c जो कि Real A/c के अन्तर्गत आता है।
Example 2 : मान लीजिए हमें Krishna से 5000 रूपये प्राप्त हुए, यहाँ भी दो खाते प्रभावित हो रहे हैं
-
- Krishna का A/c (Personal A/c)
- Cash A/c (Real A/c)
चूँकि Krishna यहाँ देने वाला है,इसलिए उसका A/c Credit होगा |
Real Account (वास्तविक खाता) :
जो वस्तु व्यापार में आए उसे Debit करें तथा जो वस्तु व्यापार से जाए उसे Credit करें। Debit which comes in Credit which goes out
मान लीजिए हमने 1000 रूपया का नगद फर्नीचर खरीदा, तो इसमें भी दो Accounts प्रभावित हुए –
-
- Furniture A/c
- Cash A/c
यहाँ Cash गया, इसलिए वह Credit किया जाएगा तथा Furniture आया, इसलिए Furniture A/c को Debit किया जाएगा ।
Nominal Account (नाममात्र के खाते) : व्यय एवं हानियों को Debit करें तथा आय एवं लाभों को Credit करें। Debit the Expenses and Losses and Credit the Incomes and Gains
मान लीजिए हमने 1500 नगदी वेतन चुकाया, यहाँ भी दो Accounts प्रभावित हो रहे है|
-
- Salary Accounts (Nominal A/c)
- Cash Accounts ( Real A/c)
First Salary Account जो कि Nominal A/c है तथा दूसरा Cash A/c जो कि Real A/c है। इसलिए खाते में एंट्री करते समय दोनो खातों के नियमों का ध्यान रखा जाएगा।
Salary देना चूँकि एक तरह का खर्चा है ,और यह Nominal A/c है और Nominal A/c के नियमानुसार व्यय एवं हानियों को Debit करे, तो यहाँ Salary A/c Debit होगा। और Cash Account, Real A/c के अन्तर्गत आएगा और जैसे कि Real A/c को लिखने का नियम है जो वस्तु व्यापार से जाए उसे Credit करें, और चूँकि यहाँ Cash A/c गया है, इसलिए Cash A/c Credit किया जाएगा।
Journal (रोजनामचा) – हिसाब -किताब करते वक्त कोई भी Entry सीधे Ledger में नहीं की जाती है, बल्कि पहले उसे Journal में लिखा जाता है। Tally में जब हम खाता बनाते हैं, तो वह अपने आप ही संबंधित खातो में Entry कर देता है।
Commerce के शब्दों में Journal यानि रोजनामचा व्यापारियों की वह प्रारंभिक पुस्तक है, जिसमें दैनिक लेन-देन का लेखा-जोखा होता है,यह तिथि के अनुसार एवं उसी क्रम में होती । यह Debit और Credit में वर्गीकृत होते हैं।
Rules of Journal Entry:
Rule 1. यह देखें कि दो प्रभावित होने वाले खाते कौन-कौन हैं।
Example of Journal Entry
मान लिजिए कि एक व्यक्ति है Rahul, उसने एक Business शुरू किया 20,000 रूपये से और रोजमरी के लिए उसके जो भी Transaction हुए उसने उसको याददाश्त के लिए एक कागज पर लिख लिया। जो कि इस प्रकार हैंः-
अब सवाल उठता है कि उसको Tally me Entry कैसे किया जाए ? आईये समझते है –
राहुल ने Rs. 2,00,000 से व्यापार प्रारंभ किया –
- Cash A/c –> (R) -> Dr.
- Capital A/c –> (P) -> Cr.
यहां राहुल ने ब्यापार प्रारंभ किया | जैसा कि हर Transaction में दो खाते प्रभावित होते है, यहाॅं भी दो खाते प्रभावित हो रहे हैं चूूॅंकि राहुल ने व्यापार में 2,00,000 रूपए लगाए तो पहला खाता Cash A/c हो गया और जैसा कि हमलोग जानते हैं, जब भी किसी Business में कोई माल लगाया जाता है, या पैसा लगाया जाता है, वह पूॅंजी के रूप में होता है, यानि कि Capital A/c इसलिए यहाॅं प्रभावित होने वाले खाते हैं – Cash A/c और Capital A/c |
नोट : व्यापार के स्वामी या मालिक के नाम का कोई खाता नहीं खोला जाता । जब वह पूँजी लगाता है,तो वह Capital A/c में Convert हो जाता है।
2. राम से Rs. 10,000 का माल खरीदा –
- Purchase A/c –> (N) –> Dr.
- Ram A/c –> (P) –> Cr.
इस Transaction में राम से माल ख़रीदा गया | यहाँ ध्यान देने योग्य है कि “राम से माल ख़रीदा” में यह नहीं दिया गया है कि माल नगद ख़रीदा या उधार में, तो ऐसे में मान लिया जाता है कि माल उधार में ख़रीदा या बेचा गया | यहाॅं भी दो खाते प्रभावित हो रहे हैं चूूॅंकि राम से माल ख़रीदा, इसलिए Purchase A/c और व्यक्ति से सम्बंधित Ram A/c |
इसी सिद्धांत पर निम्नलिखित सभी लेन -देन (Transaction) को समझे-
3. Rs. 5000 का माल खरिदा –
- Purchase A/c–> (N) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
4. मोहन से नगद माल Rs 7000 में खरीदा-
- Mohan A/c –> (P) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
5. Rs. 50000 में भवन खरीदा –
- Building A/c –> (R) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
6. Rs. 2000 मजदूरी दी –
- Wages A/c –> (N) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
7. नगद माल Rs. 1800 मे बेचा –
- Sales A/c –> (N) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Dr.
8. व्यापार के स्वामी ने निजी खर्च हेतु व्यापार से 2000 रू निकाले-
- Drawings A/c –> (P) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
9. मोहन को Rs.7000 में नगद माल बेचा-
- Sales A/C -> (N) –> Cr.
- Cash A/C –> (R) –> Dr.
10. कार्यालय के लिए 5000 रुपये का फर्नीचर खरीदा –
- Furniture A/C –> (R) –> Dr.
- Cash A/C –> (R) –> Cr.
11. रमेश को नगद बेतन 3000 रुपये दिया-
- salary A/C –>(N) –> Dr.
- Cash A/C –> (R) –> Cr.
12. अशोक से 5000 रुपये उधार लिए –
- Ashok A/C –>(P) –>Cr.
- Cash A/C –> (R) –> Dr.
13. अशोक को 5000 रुपये भुगतान किया –
- Ashok A/C –> (P) –> Dr.
- Cash A/C –> (R) –> Cr.
14. 1000 रुपये दुकान का किराया दिया –
- Rent A/C –>(N) –> Dr.
- Cash A/C –> (R) –> Cr.
15. बैंक में खाता खोला तथा नगद जमा किए 10000 –
- Bank A/C –> (P) –> Dr.
- Cash A/C –> (R) –> Cr.
16. बैंक से 3000 रुपये नगद निकाले –
- Bank A/C –> (P) –> Cr.
- Cash A/C –> (N) –> Dr.
17. मनोज से 5000 रुपये में माल खरीदा –
- Manoj A/C –> (P) –> Cr.
- Purchase A/C –> (N) –> Dr.
18. मनोज को चेक द्वारा 5000 रुपये का भुगतान किया –
- Manoj A/C –> (P) –> Dr.
- Bank A/C –> (P) –> Cr.
19. रवि को Rs. 6000 का माल बेचा –
- Ravi A/C –> (P) –> Dr.
- Sales A/C –> (N) –> Cr.
20.रवि से 6,000 रुपये का चेक प्राप्त हुआ-
- Ravi A/C –> (P) –>Cr.
- Bank A/C –> (P) –>Dr.
21. 2000 रुपये कमीशन दिया –
- Commission A/C –> (N)–> Dr.
- Cash A/C –> (N) –> Cr.
22. सुरेश को ब्याज पर 2000 रूपए उधार दिए –
- Suresh A/c –> (P) –> Dr.
- Cash A/c –> (R) –> Cr.
23. सुरेश से 500 रुपये का ब्याज का चेक प्राप्त हुआ –
- Interest A/C –> (N) –> Cr.
- Bank A/C –> (P) –> Dr.
इस तरह, हमे Tally or Tally ERP9 में भी Accounts रखने के लिए व्यापर में होने वाले लेन – देन को निम्नलिखित तरीके से समझना होगा –
- Purchase – कितना माल ख़रीदा ?
- Sales – कितना माल बेचा ?
- Payment – किसको कितना पेमेंट किया?
- Receipt – किससे कितना पेमेंट आया?
- Creditors – हमें जिन लोगो को रुपये देने है |
- Debtors – हमें जो लोग रुपये देंगे |
- Profit & Loss – कितना Profit या Loss हुआ ?
- Stock – कितना Stock रखा है ?
- Expenses – कितने खर्चे हुए ?
- Income – कितनी आमदनी हुयी?
इन सब चीजों को हमे Tally or Tally ERP9 में एंट्री करना पड़ता है और इन्ही business Transaction को record करके Tally ERP9 में Accounting का काम किया जाता है और इन्ही लेन देन को लिखने के सिद्धांत को accounting कहा जाता है | अब Accounting के क्या फायदे है वो जानते है –
Accounting के फायदे –
- किसी भी दुकान या व्यबसाय में होने वाले सभी लेन देन का रिकॉर्ड रखा जा सकता है |
- किसी भी दुकान या व्यबसाय का हिसाब किताब – जैसे दुकानदार को कितने रुपये देने है या दुकानदार को कितने रुपये लेने है इसका रेकोइर्द आसानी से रखा जा सकता है |
- किसी भी दुकान या व्यबसाय में Profit हो रहा या loss हो रहा इसका पता लगाया जा सकता है |
- किसी भी दुकान या व्यबसाय में कितने खर्चे हो रहे है इसका पूरा हिसाब रखा जा सकता है |
- अभी दुकान में कितना रहतिया या stock पड़ा है पता लगाया जा सकता है |
- व्यापार में कितना Cash Balance है या कितना Bank Balance है इसका रिकॉर्ड रखा जा सकता है |
- व्यापर में होने वाले हर लेन देन का हिसाब Accounting Software के जरिये आसानी से रखा जा सकता है |
आज कल बाज़ार में बहुत सारे Accounting Software आ चुके है उन्ही में से एक बहित ही प्रसिद्द Software है Tally ERP9 और Tally Full Course with GST को पूरा करने के बाद आप आसानी से Accounting का काम कर सकते है |
यकीन मानिए अगर आप concept को अच्छे से समझ जाते है तो Tally ERP9 में काम करना बहुत ही आसान है बस हमें Tally में लेन देन को रिकॉर्ड करना सीखना होगा जो हम आगे चलकर सीखेंगे | बाकी के रिपोर्ट्स अपने आप तैयार हो जाते है |


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